कुपवाड़ा/श्रीनगर: कश्मीर की खूबसूरत वादियों में प्रतिभा और काबिलियत की कोई कमी नहीं है। यहाँ के नौजवान और शिक्षाविद अपनी मेहनत, लगन और बुलंद हौसलों के दम पर दुनिया भर में अपनी अलग पहचान बना रहे हैं। इसी सिलसिले में उत्तरी कश्मीर के कुपवाड़ा जिले के दूरदराज़ इलाके करनाह के दिलदार गाँव से ताल्लुक रखने वाले प्रोफेसर अहसान उल हक कुरैशी ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक शानदार कामयाबी हासिल की है। उन्हें ब्रिटेन की प्रतिष्ठित रॉयल सोसाइटी ऑफ केमिस्ट्री ने चार्टर्ड केमिस्ट (सीकेम) की पेशेवर उपाधि प्रदान की है। यह उपलब्धि न सिर्फ उनके परिवार और करनाह इलाके, बल्कि पूरे जम्मू-कश्मीर के लिए फख्र और खुशी का पैग़ाम है।
प्रोफेसर अहसान उल हक कुरैशी वर्तमान में संयुक्त अरब अमीरात की खलीफा यूनिवर्सिटी में रसायन विज्ञान के प्रोफेसर के तौर पर अपनी सेवाएँ दे रहे हैं। विज्ञान और शोध के क्षेत्र में उनकी वर्षों की मेहनत, समर्पण और उल्लेखनीय योगदान को देखते हुए उन्हें यह प्रतिष्ठित मान्यता मिली है। ब्रिटेन की रॉयल सोसाइटी ऑफ केमिस्ट्री द्वारा दी जाने वाली चार्टर्ड केमिस्ट उपाधि रसायन विज्ञान के क्षेत्र में पेशेवर दक्षता, अनुभव और उच्च मानकों के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाती है।
प्रोफेसर कुरैशी की वैज्ञानिक उपलब्धियों का सफर बेहद प्रेरणादायक रहा है। उन्होंने अब तक 150 से अधिक शोध पत्र प्रकाशित किए हैं और 100 से ज्यादा अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में वैज्ञानिक योगदान दिया है। वर्ष 2022 से वह रॉयल सोसाइटी ऑफ केमिस्ट्री के फेलो भी हैं। उनकी यह उपलब्धि बताती है कि कश्मीर के दूरदराज़ इलाकों से निकलने वाले प्रतिभाशाली लोग भी दुनिया के प्रतिष्ठित वैज्ञानिक संस्थानों में अपनी काबिलियत का लोहा मनवा सकते हैं।
वर्तमान में प्रोफेसर कुरैशी खलीफा यूनिवर्सिटी में रसायन विज्ञान के स्नातकोत्तर अध्ययन से जुड़े एसोसिएट चेयर तथा सेंटर फॉर कैटेलिसिस एंड सेपरेशन्स के सह-निदेशक की ज़िम्मेदारी भी निभा रहे हैं। उनका शोध मुख्य रूप से उन्नत पदार्थों, स्वच्छ ऊर्जा तकनीकों और पर्यावरणीय स्थिरता पर केंद्रित है। विज्ञान के ये क्षेत्र आने वाले दौर में ऊर्जा संकट, पर्यावरण संरक्षण और टिकाऊ विकास जैसी वैश्विक चुनौतियों से निपटने में बेहद अहम भूमिका निभा सकते हैं।
करनाह जैसे सरहदी और पहाड़ी इलाके से निकलकर अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक मंच पर इतनी बड़ी पहचान बनाना अपने आप में एक मिसाल है। यह कामयाबी कश्मीर के उन हजारों विद्यार्थियों के लिए उम्मीद की नई किरण है, जो सीमित संसाधनों के बावजूद विज्ञान, तकनीक और उच्च शिक्षा के क्षेत्र में अपना मुस्तकबिल संवारने के ख्वाब देखते हैं।
प्रोफेसर कुरैशी की सफलता यह पैग़ाम देती है कि अगर इंसान के इरादे मजबूत हों और दिल में कुछ कर गुज़रने का जज़्बा हो, तो भौगोलिक दूरियाँ और मुश्किल हालात भी उसकी तरक्की का रास्ता नहीं रोक सकते।
उनकी उपलब्धि से कश्मीर में वैज्ञानिक शिक्षा, अनुसंधान और नवाचार को बढ़ावा देने की अहमियत भी सामने आती है। स्थानीय स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में विद्यार्थियों को बेहतर प्रयोगशालाएँ, शोध सुविधाएँ और अनुभवी वैज्ञानिकों की रहनुमाई मिले, तो घाटी से भविष्य में और भी कई अंतरराष्ट्रीय स्तर के वैज्ञानिक उभर सकते हैं।
प्रोफेसर अहसान उल हक कुरैशी की यह शानदार कामयाबी सिर्फ एक वैज्ञानिक सम्मान नहीं, बल्कि पूरे कश्मीर के लिए गर्व और प्रेरणा की कहानी है। करनाह के एक छोटे से गाँव से निकलकर दुनिया के प्रतिष्ठित वैज्ञानिक मंच तक पहुँचना इस बात की खूबसूरत मिसाल है कि कश्मीर का असली सरमाया यहाँ के मेहनती, हुनरमंद और काबिल लोग हैं। उनकी सफलता आने वाली पीढ़ियों को यह पैग़ाम देती रहेगी कि तालीम, मेहनत और बुलंद हौसलों के दम पर कश्मीर का हर नौजवान दुनिया में अपनी पहचान बना सकता है।


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