पाकिस्तान में आतंकवाद और सैन्य प्रतिष्ठान के बीच रिश्तों को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। लश्कर-ए-तैयबा के डिप्टी चीफ सैफुल्लाह कसूरी के सामने आए बयानों ने इस बहस को और गहरा कर दिया है। कसूरी ने खुले तौर पर दावा किया कि पाकिस्तानी सेना उसे अपने कार्यक्रमों में बुलाती है और यहां तक कि शहीद सैनिकों की जनाजे की नमाज़ पढ़ाने के लिए भी निमंत्रण भेजती है। यह दावा ऐसे आतंकी संगठन के वरिष्ठ नेता की तरफ से आया है, जिसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आतंकवादी संगठन के तौर पर चिन्हित किया गया है।

कसूरी, हाफिज सईद के नेतृत्व वाले लश्कर-ए-तैयबा का वरिष्ठ चेहरा है। भारतीय सुरक्षा एजेंसियां उसे पहलगाम आतंकी हमले से जुड़े प्रमुख आरोपियों में गिनती हैं। जनवरी 2026 में सामने आए उसके एक वीडियो में उसने पाकिस्तानी सेना के साथ अपने कथित करीबी संबंधों को लेकर सार्वजनिक रूप से बात की थी। इस दौरान उसने भारत के खिलाफ भी उकसावे वाली बातें कीं और अपनी पहुंच को लेकर शेखी बघारी। 

सबसे गौर करने वाली बात यह है कि यहां रिश्ता सिर्फ किसी छिपे हुए संपर्क का आरोप भर नहीं रह जाता। कसूरी के अपने दावे के मुताबिक, पाकिस्तानी सेना के कार्यक्रमों में एक लश्कर कमांडर की मौजूदगी रही है। अगर किसी आतंकी संगठन के वरिष्ठ नेता को सैन्य कार्यक्रमों में बुलाया जाता है और सैनिकों के अंतिम संस्कार जैसी धार्मिक रस्मों में भूमिका दी जाती है, तो इससे पाकिस्तान के उस दावे पर सवाल उठता है कि उसकी संस्थाएं आतंकवाद के खिलाफ पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं।

हाफिज सईद का नाम भी इस पूरे नेटवर्क में बेहद अहम माना जाता है। वह लश्कर-ए-तैयबा का संस्थापक और संयुक्त राष्ट्र द्वारा नामित आतंकवादी है। उसके संगठन पर भारत समेत कई देशों में आतंकवादी गतिविधियों के आरोप रहे हैं। ऐसे में उसके करीबी सहयोगी द्वारा पाक सेना के साथ अपने संबंधों का सार्वजनिक उल्लेख पाकिस्तान की आतंकवाद नीति पर नई बहस को जन्म देता है।

पिछले वर्षों में भी लश्कर के नेताओं और पाकिस्तान की सैन्य-सुरक्षा व्यवस्था के बीच कथित संपर्कों को लेकर रिपोर्टें सामने आती रही हैं। मई 2025 में भी कसूरी को लाहौर में ऐसे कार्यक्रम में देखा गया था जहां पाकिस्तानी सुरक्षा और खुफिया अधिकारियों की मौजूदगी की रिपोर्ट हुई थी। 

हालांकि, हाफिज सईद के पिछले 40 वर्षों से वरिष्ठ पाकिस्तानी सैन्य अधिकारियों से गुप्त मुलाकात करने और उन्हें शासन चलाने की सलाह देने वाले विशिष्ट दावे की स्वतंत्र पुष्टि अभी जरूरी है। मगर कसूरी के सार्वजनिक बयानों से इतना जरूर साफ होता है कि लश्कर और पाकिस्तान के सैन्य प्रतिष्ठान के बीच कथित नजदीकी को लेकर गंभीर सवाल मौजूद हैं।

यही वजह है कि कसूरी का बयान पाकिस्तान के लिए सिर्फ एक आतंकी की बयानबाजी नहीं, बल्कि उसके आतंकवाद-विरोधी दावों की विश्वसनीयता पर उठता हुआ एक बड़ा सवाल बन गया है।