पीओजेके में जनआक्रोश से घबराया पाकिस्तान, ख्वाजा आसिफ ने लगाया भारत और RAW पर आरोप


पाकिस्तान के वज़ीर-ए-दिफा ख्वाजा आसिफ ने एक बार फिर वही पुराना राग अलापा है। उन्होंने दावा किया है कि पीओजेके में चल रहे एहतिजाज यानी विरोध प्रदर्शन भारत के इशारे पर हो रहे हैं और इनके पीछे भारतीय एजेंसियों के कथित प्रॉक्सी, मीडिया नेटवर्क और विदेशों में बैठे समर्थक काम कर रहे हैं। लेकिन सवाल ये है कि अगर हर आवाज़ भारत की साज़िश है तो फिर पीओजेके के लोग आखिर सड़कों पर क्यों उतर रहे हैं?

जनाब, हक़ीक़त इससे बिल्कुल जुदा है। पीओजेके में पिछले कई महीनों से लोग बढ़ती महंगाई, बेरोज़गारी, बिजली संकट, खराब इंतज़ामिया और बुनियादी हुकूक की कमी के खिलाफ आवाज़ उठा रहे हैं। वहां के लोग अपने हक़, बेहतर ज़िंदगी और फैसलों में हिस्सेदारी की मांग कर रहे हैं। मगर पाकिस्तान की हुकूमत इन जायज़ मांगों को सुनने के बजाय हर बार भारत और रॉ का नाम लेकर असल मसले से ध्यान हटाने की कोशिश करती है।

कश्मीरी अवाम पूछ रही है कि अगर सब कुछ ठीक है तो फिर एहतिजाज क्यों बढ़ रहे हैं? क्यों नौजवान अपने भविष्य को लेकर मायूस हैं? क्यों आम लोग अपने ही इलाकों में खुद को बेबस महसूस कर रहे हैं? इन सवालों का जवाब देने के बजाय पाकिस्तान की सियासी कियादत और फौजी निजाम विरोध करने वालों को देशद्रोही, विदेशी एजेंट और भारत समर्थक बताने में मशगूल है।

देखिये साहब, ये पाकिस्तान की कोई नई रणनीति नहीं है। जब भी अंदरूनी नाकामी सामने आती है, तब भारत को जिम्मेदार ठहराने की कोशिश की जाती है। इससे पहले भी बलूचिस्तान, खैबर पख्तूनख्वा और सिंध में उठने वाली आवाज़ों को विदेशी साज़िश कहकर दबाया जाता रहा है। अब वही तरीका पीओजेके में भी अपनाया जा रहा है।

असलियत ये है कि पीओजेके के लोग लंबे अरसे से कई मुश्किलात का सामना कर रहे हैं। वहां आर्थिक हालात कमजोर हैं, रोजगार के मौके सीमित हैं और आम लोगों को फैसले लेने की प्रक्रिया में पर्याप्त भागीदारी महसूस नहीं होती। स्थानीय आबादी लगातार शिकायत करती रही है कि उनकी आवाज़ को गंभीरता से नहीं लिया जाता। मगर इन शिकायतों पर गौर करने के बजाय पाकिस्तान की हुकूमत उन्हें भारत से जोड़कर अपनी जिम्मेदारी से बच निकलना चाहती है।

ख्वाजा आसिफ का बयान भी इसी सोच का हिस्सा नजर आता है। उन्होंने ये साबित करने की कोशिश की कि विरोध करने वाले लोग स्थानीय नहीं बल्कि किसी बाहरी एजेंडे का हिस्सा हैं। लेकिन अगर ऐसा होता तो हजारों लोग अपने रोजमर्रा के मसलों को लेकर बार-बार सड़कों पर नहीं उतरते। अवाम की नाराज़गी किसी प्रॉक्सी नेटवर्क की देन नहीं बल्कि उन समस्याओं का नतीजा है जिनका सामना वे बरसों से कर रहे हैं।

आज पीओजेके में उठ रही आवाज़ें एक साफ पैगाम दे रही हैं कि लोग अपने हक़ चाहते हैं, बेहतर हुकूमत चाहते हैं और अपनी परेशानियों का हल चाहते हैं। लेकिन पाकिस्तान की हुकूमत इन आवाज़ों को सुनने के बजाय उन्हें दबाने और भारत पर इल्जाम लगाने में लगी हुई है।

यही पाकिस्तान की सबसे बड़ी विडंबना है। एक तरफ वह दुनिया के सामने जम्हूरियत और इंसानी हुकूक की बातें करता है और दूसरी तरफ अपने ही कब्जे वाले इलाकों में उठने वाली आवाज़ों को साज़िश करार देता है। भारत को हर मसले का जिम्मेदार ठहराना आसान है, मगर इससे पीओजेके के लोगों की परेशानियां खत्म नहीं होंगी। आखिरकार हकीकत वही रहती है जो जमीन पर नजर आती है और आज जमीन पर नजर आ रहा है कि पीओजेके के लोग अपने हक़ और बेहतर मुस्तकबिल के लिए आवाज़ बुलंद कर रहे हैं।

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