जल, सुरक्षा और संप्रभुता: पाकिस्तान की लॉफेयर रणनीति पर भारत का जवाब




पाकिस्तानी वकील हसन असलम शाद ने हाल ही में भारत द्वारा सिंधु जल संधि (IWT) को स्थगित रखने के फैसले पर सवाल उठाए। लेकिन भारत का कहना है कि इस मसले को सिर्फ कानूनी नजरिए से देखना सही नहीं होगा। असल मुद्दा क्षेत्रीय सुरक्षा, आतंकवाद और दोनों मुल्कों के बीच भरोसे का है।

1960 में विश्व बैंक की मध्यस्थता में भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि पर दस्तखत हुए थे। इस समझौते के तहत पाकिस्तान को सिंधु, झेलम और चिनाब जैसी पश्चिमी नदियों का बड़ा हिस्सा मिला, जबकि भारत को रावी, ब्यास और सतलुज नदियों का अधिकार मिला। भारत, ऊपरी तटीय देश होने के बावजूद, शांति और स्थिरता की खातिर इस व्यवस्था पर राज़ी हुआ।

संधि के तहत भारत को पश्चिमी नदियों पर जलविद्युत परियोजनाएं, सिंचाई योजनाएं और सीमित जल भंडारण संरचनाएं बनाने का अधिकार भी मिला। लेकिन वर्षों से पाकिस्तान ने भारत की कई परियोजनाओं पर आपत्ति जताई और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर विवाद खड़े किए। भारत का मानना है कि इससे उसकी वैध विकास योजनाओं में रुकावट पैदा हुई।

भारत का तर्क है कि आज बहस सिर्फ पानी की नहीं है। सवाल यह है कि क्या एक देश अंतरराष्ट्रीय समझौतों के लाभ लेता रहे और साथ ही उसकी जमीन से सक्रिय आतंकवादी संगठन पड़ोसी देश पर हमले करते रहें?

साल 2016 में उरी में हुए आतंकी हमले ने भारत की सुरक्षा नीति को बदल दिया। इस हमले में 19 भारतीय सैनिक शहीद हुए। इसके जवाब में भारत ने नियंत्रण रेखा के पार सर्जिकल स्ट्राइक की।

फिर 2019 में पुलवामा हमला हुआ, जिसमें 40 सीआरपीएफ जवान शहीद हुए। इस हमले की जिम्मेदारी पाकिस्तान आधारित आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद ने ली। इसके बाद भारत ने बालाकोट में आतंकी ठिकानों पर हवाई कार्रवाई की।

हाल के वर्षों में पहलगाम आतंकी हमले ने भी सुरक्षा चिंताओं को और बढ़ा दिया। इस घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा किया कि सीमा पार आतंकवाद क्षेत्रीय शांति के लिए सबसे बड़ा खतरा बना हुआ है।

भारत का कहना है कि जब तक आतंकवाद पर प्रभावी कार्रवाई नहीं होती, तब तक दोनों देशों के बीच सामान्य संबंध और विश्वास कायम करना मुश्किल है। नई दिल्ली का मानना है कि वह पाकिस्तान को पानी से वंचित नहीं करना चाहता, बल्कि संधि के तहत मिले अपने वैध अधिकारों का पूरा उपयोग करना चाहता है।

भारत अब जलविद्युत परियोजनाओं, बांधों, सिंचाई नेटवर्क और जल भंडारण संरचनाओं के निर्माण को तेज कर रहा है। भारतीय नीति-निर्माताओं के अनुसार यह केवल विकास का मुद्दा नहीं, बल्कि जल सुरक्षा, ऊर्जा सुरक्षा और राष्ट्रीय हितों से जुड़ा मामला है।

विशेषज्ञों का मानना है कि दक्षिण एशिया में स्थायी शांति केवल संधियों और कानूनी बहसों से नहीं आएगी। इसके लिए आतंकवादी ढांचे को समाप्त करना, कट्टरपंथ पर रोक लगाना और पड़ोसी देशों के बीच विश्वास बहाल करना जरूरी है।

भारत का संदेश साफ है—सहयोग और शांति तभी संभव है जब दोनों पक्ष अपनी जिम्मेदारियों का पालन करें। आतंकवाद और विश्वास एक साथ नहीं चल सकते। सिंधु जल संधि पर भारत की नई सोच केवल जल नीति नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता से जुड़ा एक व्यापक रणनीतिक दृष्टिकोण है।

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