
मौलाना ने उन अफ़राद और तंजीमों पर भी सख़्त नाराज़गी ज़ाहिर की जो खुद को “मुजाहिदीन” कहकर मज़हब का नाम इस्तेमाल करते हुए हिंसा फैला रहे हैं। उनका कहना था कि इस्लाम रहमत, सब्र और इंसानियत का पैग़ाम देता है, ना कि दहशत और ख़ूनरेज़ी का। उन्होंने अफ़सोस जताया कि कुछ लोग दीन को अपनी सियासी और फ़ौजी मंशाओं के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं, जिससे पूरी उम्मत बदनाम हो रही है।
कश्मीर और पाकिस्तान के कई इलाकों में अवाम के बीच ये बयान बड़ी बहस का सबब बन गया है। लोगों का कहना है कि पहली बार इतने बड़े मज़हबी रहनुमा खुलकर मिलिटेंट हिंसा के खिलाफ़ बोल रहे हैं। इससे ये भी ज़ाहिर होता है कि पाकिस्तान के अंदर दीनि क़यादत और फ़ौजी निज़ाम के बीच फासला बढ़ रहा है। कई उलमा अब खुलकर ये कहने लगे हैं कि मज़हब के नाम पर बंदूक उठाना इस्लाम नहीं बल्कि इंतिहापसंदी है।
सियासी और समाजी माहिरीन का मानना है कि पाकिस्तान इस वक्त “असल इस्लाम” और “हिंसक सोच” के बीच जंग से गुज़र रहा है। एक तरफ़ वो लोग हैं जो इस्लाम को अमन, भाईचारा और इंसाफ़ का मज़हब मानते हैं, जबकि दूसरी तरफ़ कुछ गिरोह मज़हब को हिंसा और डर फैलाने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं।
मौलाना फ़ज़लुर रहमान का ये बयान पाकिस्तान के मौजूदा माहौल में एक अहम मोड़ माना जा रहा है। अवाम में ये पैग़ाम तेज़ी से फैल रहा है कि दीन का रास्ता इंसानियत और अमन से होकर जाता है, ना कि बारूद और बंदूक से।

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