इस प्रोग्राम का बुनियादी मक़सद था—भारतीय सेना और स्थानीय नौजवानों के दरमियान खुला और तामीरी (constructive) डायलॉग क़ायम करना, ताकि आपसी भरोसा, समझ और ज़िम्मेदारी का एहसास पैदा हो। नया कश्मीर के वसीअ विज़न के तहत, इस पहल ने ख़ास तौर पर नौजवानों, और बिलख़ुसूस ख़वातीन को, समाज की तामीर में एक अहम किरदार के तौर पर उभारा। यह सिर्फ़ एक इवेंट नहीं था, बल्कि जमीनी सतह पर भरोसा बनाने और सिविल-मिलिट्री तालमेल को मज़बूत करने की एक सोची-समझी कोशिश थी।
इस प्रोग्राम में 300 से ज़्यादा तालिबात और कॉलेज स्टाफ ने पूरे जोश के साथ हिस्सा लिया, जो इसे इलाके के बड़े यूथ एंगेजमेंट्स में शामिल करता है। माहौल दोस्ताना और शामिलियती (inclusive) रखा गया, जहाँ हर शख़्स को अपनी बात रखने का पूरा मौक़ा मिला। ओपन माइक फ़ॉर्मेट ने तालिबात को बेझिझक अपनी राय पेश करने का हौसला दिया। सीनियर आर्मी अफ़सरान की मौजूदगी और उनकी तरफ से सीधे जवाबात ने इस गुफ़्तगू को और भी असरदार बना दिया।
इस दौरान कई अहम मौज़ूआत पर बात हुई—कश्मीर मसले से लेकर तालीम, रोज़गार के मौक़े, तालिबात की मुश्किलात और समाज में नौजवानों की ज़िम्मेदारी तक। गुफ़्तगू का मक़सद सिर्फ़ मसाइल उठाना नहीं था, बल्कि उनके हल की तरफ मिलकर सोचने की राह निकालना भी था। इस खुले अंदाज़ ने डर और झिझक को कम किया और तालिबात को एतमाद (confidence) के साथ अपने ख्यालात पेश करने का मौक़ा दिया।
प्रोग्राम में खास मेहमान के तौर पर मौजूद थीं मिस तस्लीमा अख़्तर, जो एसोसिएशन ऑफ़ टेरर विक्टिम्स इन कश्मीर (ATVK) की चेयरपर्सन हैं। वो खुद मिलिटेंट हिंसा की सर्वाइवर हैं—1999 में उनके वालिद और भाई का अपहरण हुआ था। इसके बावजूद उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और आज वो कश्मीर में आतंकवाद से प्रभावित लोगों की आवाज़ बन चुकी हैं। उन्होंने अपने तजुर्बात साझा किए और अमन, सब्र और समाजी ज़िम्मेदारी की अहमियत पर ज़ोर दिया। उनकी बातें तालिबात के दिलों को छू गईं और उन्हें एक नई सोच और हिम्मत दी।
इस प्रोग्राम का एक अहम पहलू था—ख़वातीन का इख़्तियार (women empowerment)। एक विमेन्स कॉलेज में इस तरह का प्लेटफॉर्म देना अपने आप में एक बड़ा क़दम था। यहाँ लड़कियों को खुलकर बोलने, सवाल करने और अपने ख्वाब बयां करने का मौक़ा मिला। कई तालिबात ने महसूस किया कि ऐसे प्लेटफॉर्म्स उन्हें न सिर्फ़ एतमाद देते हैं, बल्कि उन्हें अपनी ज़िंदगी और करियर के फैसलों में आगे बढ़ने का हौसला भी देते हैं। यह पहल इस बात को भी उजागर करती है कि कश्मीर में अमन और तरक़्क़ी के लिए ख़वातीन का रोल कितना अहम है।
इस पहल को तालिबात और स्टाफ दोनों ने बहुत सराहा। कईयों ने कहा कि पहली बार उन्हें इस तरह का मौक़ा मिला, जहाँ वो सीधे सीनियर आर्मी अफ़सरान से बात कर सकीं। इस तरह का राब्ता ग़लतफ़हमियों को कम करने और आपसी एहतिराम को बढ़ाने में मददगार साबित होता है।
बड़ी तस्वीर में देखा जाए तो यह प्रोग्राम भारतीय सेना की उस सोच को दर्शाता है, जो सिर्फ़ सुरक्षा तक महदूद नहीं, बल्कि समाज के साथ मिलकर आगे बढ़ने पर यक़ीन रखती है। ऐसे कम्युनिटी-फोकस्ड एप्रोच से न सिर्फ़ मौजूदा हालात बेहतर होते हैं, बल्कि आने वाले वक्त के लिए भी एक मज़बूत बुनियाद तैयार होती है।
जैसे-जैसे नया कश्मीर का ख़्वाब हक़ीक़त बन रहा है, वैसे-वैसे नौजवानों की भूमिका और भी अहम होती जा रही है। “वालिव कथ – बात कराव” जैसे प्लेटफॉर्म उन्हें अपनी आवाज़ उठाने, सोचने और समाज में अपना किरदार निभाने का मौक़ा देते हैं।
आख़िर में, पुलवामा में मुनअक़िद यह प्रोग्राम इस बात की वाज़ेह मिसाल है कि जब गुफ़्तगू खुली हो और नीयत साफ़, तो बदलाव मुमकिन है। भारतीय सेना और नौजवानों के दरमियान यह क़रीबी ताल्लुक़ भरोसे, उम्मीद और तरक़्क़ी की नई राह खोलता है। अगर ऐसे प्रयास जारी रहे, तो कश्मीर का मुस्तक़बिल यक़ीनन ज़्यादा रोशन, पुरअमन और शामिलियती होगा।

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