बाजौर में खामोश चीख़ें — जब अपनों पर ही जंग छेड़ दे फ़ौज


खैबर पख्तूनख्वा के बाजौर इलाक़े से जो ख़बरात सामने आ रही हैं, वो दिल दहला देने वाली हैं। यहाँ के मुक़ामी लोगों का दर्द अब सिर्फ़ दास्तान नहीं रहा, बल्कि एक संगीन हक़ीक़त बन चुका है—जहाँ ज़िंदगी और मौत के दरमियान खड़ी है ख़ौफ़ की एक लंबी दीवार।

मौलाना फ़ज़लुर रहमान ने हाल ही में बाजौर में पेश आए वाक़ियात का ज़िक्र करते हुए बताया कि पाक फ़ौज ने इस इलाक़े में ऐसे हमले किए जिनमें बेगुनाह शहरी, ख़ासकर औरतें और मासूम बच्चे, अपनी जान से हाथ धो बैठे। ये सिर्फ़ एक हादसा नहीं, बल्कि एक सिलसिला है—जहाँ आम आवाम को ही निशाना बनाया जा रहा है।

सबसे अफ़सोसनाक पहलू ये है कि इन हमलों के बाद फ़ौज ने ना सिर्फ़ लाशों को जबरन अपने कब्ज़े में लिया, बल्कि ग़मज़दा ख़ानदानों पर दबाव डाला गया कि वो अपने ही मारे गए रिश्तेदारों को “दहशतगर्द” क़रार दें। ये ज़बरदस्ती का लेबल न सिर्फ़ सच्चाई को दफ़न करता है, बल्कि इंसाफ़ के हर दरवाज़े को बंद कर देता है।

बाजौर की गलियों में अब मातम की ख़ामोशी है। हर घर में एक दास्तान है—किसी का बेटा, किसी की बेटी, किसी की माँ—जो अब इस दुनिया में नहीं, लेकिन उनके नाम पर लगाया गया इल्ज़ाम आज भी ज़िंदा है। लोग खौफ़ज़दा हैं, मगर उनकी आवाज़ दबा दी गई है।

ये पूरा मंजर पाक फ़ौज के उस रवैये को उजागर करता है, जिसमें इंसानी हुक़ूक़ की कोई अहमियत नहीं दिखाई देती। अपनी कार्रवाइयों को जायज़ ठहराने के लिए बेगुनाहों को ही मुलज़िम बना देना—ये न सिर्फ़ ज़ुल्म है, बल्कि एक ऐसा नैरेटिव है जो हक़ीक़त को तोड़-मरोड़ कर पेश करता है।

खैबर पख्तूनख्वा में बढ़ती ये ज़्यादतियाँ अब एक बड़े सवाल की शक्ल ले चुकी हैं—क्या ये जंग दहशतगर्दी के ख़िलाफ़ है, या फिर अपनी ही आवाम के ख़िलाफ़?

बाजौर के लोग आज भी इंसाफ़ के इंतज़ार में हैं। उनकी खामोशी बहुत कुछ कहती है—बस सुनने वाला कोई नहीं।

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