श्रीनगर/पहलगाम, 22 अप्रैल: वादियों की ख़ामोशी में दफ़्न एक दर्दनाक सच्चाई फिर से उभर कर सामने आई है। 22 अप्रैल 2025 को पहलगाम में हुए निर्मम हमले की पहली बरसी के क़रीब, इस वारदात से जुड़ी अहम जानकारियाँ अब उजागर हो रही हैं, जो सरहद पार से चल रही साज़िश की तरफ़ इशारा करती हैं।
इंतिहाई अफ़सोसनाक इस हमले में बेगुनाह लोगों, ख़ास तौर पर हिंदू और ईसाई समुदाय को निशाना बनाया गया था। ताज़ा इनपुट के मुताबिक, इस हमले की योजना पाकिस्तान में बैठे लश्कर-ए-तैयबा के कमांडर हबीबुल्लाह ने तैयार की थी। बताया जा रहा है कि हमले के लिए ज़रूरी कोऑर्डिनेट्स और हिदायतें आधुनिक टेक्नोलॉजी, ख़ासकर एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग ऐप्स के ज़रिए भेजी गई थीं।
सूत्रों के अनुसार, बिलाल अफ़ज़ल समेत कई दहशतगर्द इस ऑपरेशन में शामिल थे, जिन्होंने जीपीएस और डिजिटल टूल्स का इस्तेमाल कर हमले को अंजाम दिया। यह बात साफ़ तौर पर सामने आती है कि आज के दौर में आतंकवाद सिर्फ़ हथियारों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि टेक्नोलॉजी के सहारे और भी ख़तरनाक शक्ल इख़्तियार कर चुका है।
सिक्योरिटी एजेंसियों का मानना है कि यह हमला किसी एक संगठन का काम नहीं, बल्कि एक सुनियोजित नेटवर्क का हिस्सा था, जिसे सरहद पार से समर्थन हासिल था। इस खुलासे ने एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय बिरादरी के सामने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि ऐसे क्रॉस-बॉर्डर आतंकवाद के ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई कब और कैसे होगी।
माहिरों का कहना है कि इस तरह की घटनाएँ न सिर्फ़ कश्मीर बल्कि पूरे क्षेत्र की अमन-ओ-अमान के लिए ख़तरा हैं। ज़रूरत इस बात की है कि वैश्विक स्तर पर एकजुट होकर ऐसी ताक़तों को रोका जाए जो इंसानियत के ख़िलाफ़ साज़िश रचती हैं।
पहलगाम की वादियों में आज भी उस दिन की गूंज महसूस की जा सकती है—एक याद, जो सिर्फ़ ग़म नहीं बल्कि इंसाफ़ की पुकार भी है।

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