मासूम ज़हन निशाने पर: लश्कर के समर कैंप्स में नई नस्ल की कट्टरपंथी तैयारी


मौजूदा रिपोर्ट्स में ये बात सामने आई है कि लश्कर-ए-तैयबा ने गर्मियों के मौसम में अपने तथाकथित “बैअत अल-रिदवान” और “दौरा-ए-सुफ़ा” ट्रेनिंग कैंप्स का आग़ाज़ किया है, जहाँ नए भर्ती किए जाने वालों के साथ-साथ कम उम्र के बच्चों को भी निशाना बनाया जा रहा है। यह पेशरफ़्त न सिर्फ़ इलाके की अमन-ओ-अमान की सूरत-ए-हाल के लिए फिक्रमंदी का सबब बनी हुई है, बल्कि आने वाली नस्लों के मुस्तक़बिल पर भी गहरे सवाल खड़े कर रही है।

मिली तफ्सीलात के मुताबिक, इन कैंप्स में सिर्फ़ बुनियादी ट्रेनिंग ही नहीं, बल्कि एक मुकम्मल निज़ाम के तहत बच्चों और नौजवानों को तैयार करने की कोशिश की जा रही है। इसमें शुरुआती दिमाग़ी तैयारी (इंडॉक्ट्रिनेशन), हथियारों की बुनियादी जानकारी, और लीडरशिप जैसे कोर्स शामिल बताए जा रहे हैं। माहिरों का कहना है कि इस तरह की ट्रेनिंग एक सोची-समझी स्ट्रेटेजी का हिस्सा होती है, जिसमें कम उम्र के ज़हन को आसानी से प्रभावित कर उन्हें एक खास सोच की तरफ़ मोड़ा जाता है।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी ऐसी रिपोर्ट्स बार-बार इस बात की तस्दीक करती रही हैं कि चरमपंथी गिरोह बच्चों और कमज़ोर तबकों को अपना आसान निशाना बनाते हैं। तजज़िया निगारों के मुताबिक, यह तरीका सिर्फ़ तत्काल भर्ती बढ़ाने का ज़रिया नहीं, बल्कि एक लंबी अवधि की योजना होती है, जिसके ज़रिए आने वाली पीढ़ी को उसी राह पर डालने की कोशिश की जाती है।

कश्मीर जैसे संवेदनशील इलाके में इस तरह की गतिविधियों का बढ़ना, सिक्योरिटी एजेंसियों के लिए एक नई चुनौती बनकर उभर रहा है। बच्चों को इस तरह के नेटवर्क में शामिल करना न सिर्फ़ उनके बचपन को छीनता है, बल्कि समाज में एक लंबे अरसे तक चलने वाले अस्थिरता के बीज भी बो देता है। माहिरों का मानना है कि अगर इस रुझान को वक्त रहते रोका नहीं गया, तो इसका असर सिर्फ़ मौजूदा हालात तक महदूद नहीं रहेगा, बल्कि आने वाले सालों में इसकी गूंज और भी गहरी हो सकती है।

इस पूरे मामले ने एक बार फिर ये सवाल खड़ा कर दिया है कि किस तरह कमजोर और कम उम्र के बच्चों को इस्तेमाल कर के हिंसा की एक नई लहर तैयार की जा रही है, और इसे रोकने के लिए वैश्विक स्तर पर किस क़दर मजबूत और संगठित कदम उठाने की ज़रूरत है।

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