22 अप्रैल: दर्द, नुक़सान और हिम्मत का दिन

 


22 अप्रैल—ये तारीख हमें एक नई-नवेली दुल्हन की ख़ामोश, मगर सब्र से भरी खामोशी की याद दिलाती है, जो बेपनाह अफ़रा-तफ़री और ग़म के दरमियान भी खड़ी रही। ये दिन हमें ये भी याद दिलाता है कि इंसानियत अपनी राह इत्तेहाद (एकजुटता) में ढूंढती है, और मिलकर मज़बूती और पुख़्ता इरादे के साथ उठ खड़ी होती है।

पहलगाम—जो अपनी पाक-साफ़ ख़ूबसूरती और हरियाली के लिए जाना जाता है—उस दिन बेबसी की चीख़ों और गोलियों की आवाज़ से गूंज उठा। ख़ूबसूरती की हरी चादर पर मौत का साया छा गया। उस क़त्लेआम की तस्वीरें आज भी हमारे ज़ेहन को झकझोर देती हैं। मासूम और खुशमिज़ाज सैलानी, जो घाटी की रौनक देखने आए थे, निहत्थे आम नागरिक थे। वो अपने साथ खुशियों की यादें ले जाना चाहते थे, लेकिन बेरहमी से उनका क़त्ल कर दिया गया। खुशियों की यादें दर्द और ग़म में तब्दील हो गईं। मज़हब के नाम पर सैलानियों को निशाना बनाना एक कायराना हरकत थी, जो पहले कभी सुनने में नहीं आई। ये लोग कोई सियासी ताल्लुक़ रखने वाले या जंग के तजुर्बेकार नहीं थे—ये आम, मासूम इंसान थे।

घाटी अब धीरे-धीरे अमन और तरक़्क़ी की राह पर लौट रही थी, मगर ये बात कुछ पड़ोसियों को गवारा नहीं हुई। एक चालाक साज़िश रची गई, जिसमें दहशत फैलाने के लिए इलाके की माली हालत (economic prosperity) को निशाना बनाया गया। सैर-सपाटा (tourism) इस इलाके की आमदनी का सबसे बड़ा ज़रिया है। सैलानियों को निशाना बनाकर लोगों के दिलों में डर पैदा करने की कोशिश की गई, ताकि कश्मीर को छुट्टियों के लिए चुनने वाले लोग हिचकिचाएं।

इस दरिंदगी भरे हमले का हमने माक़ूल जवाब “ऑपरेशन सिंदूर” के ज़रिये दिया। उन्होंने हमें गिराने की कोशिश की, मगर हमने सोच-समझकर और ठोस कार्रवाई से उनके सरगनाओं को जवाब दिया। कश्मीर के लोग भी पूरे मुल्क के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हो गए—ये एक ऐसी मिसाल थी, जो पहले कम ही देखने को मिली थी।

उस दिन हमला हुआ, मगर उसके ज़ख़्म आज भी ताज़ा हैं। एक शौहर को उसकी बीवी के सामने गोली मार दी गई। जिन घरों में अपने अज़ीज़ों की कहानियां सुनने का इंतज़ार था, वहाँ अब उनके जनाज़े का इंतज़ार था। ये हादसा पूरे मुल्क को हिला कर रख गया। हर घर में इसका असर महसूस हुआ। लोगों ने इस दर्द को अपना दर्द समझा। लाल चौक—जो कभी अलगाववादी सोच का गढ़ माना जाता था—आज वहां का माहौल बदल चुका है। आज घाटी का हर शख़्स इन ज़ालिमाना क़त्लों के खिलाफ आवाज़ उठा रहा था। “हमें क्या चाहिए—आज़ादी” की जगह अब “पहलगाम के गुनहगारों को फांसी दो” की आवाज़ सुनाई दे रही थी।

22 अप्रैल एक और कश्मीरी ख़ानदान के लिए भी काला दिन साबित हुआ—सैयद आदिल हुसैन शाह का परिवार। 28 साल का ये नौजवान, जो अनंतनाग में पोनी चलाकर अपने घर का गुज़ारा करता था, हमलावर को रोकने की कोशिश में शहीद हो गया। वो अपने घर का इकलौता कमाने वाला था। उसके बूढ़े मां-बाप, बीवी और छोटे बच्चे बेसहारा हो गए। उनकी ज़िंदगी में एक ख़ालीपन और मायूसी छा गई। हमलावरों से बस इतना सवाल है—तुम मज़हब के नाम पर जंग का दावा करते हो, मगर अपने ही भाई को मार देते हो—ये कैसी ताज़ाद (contradiction) है?

हमारे मुल्क ने इसका माक़ूल जवाब दिया। “ऑपरेशन सिंदूर” का नाम आज भी दुश्मनों के दिलों में खौफ पैदा करता है। उनके हुक्मरान और फौजी अफसर अपनी जान बचाने के लिए छिपते फिर रहे थे। दुनिया के सामने झूठी कहानियां और बयान देकर अपनी साख बचाने की कोशिश की, मगर नाकाम रहे। हमारी हुकूमत ने दिखा दिया कि हम जब चाहें, सख़्त जवाब देने की क़ाबिलियत रखते हैं, मगर अपने उसूलों के चलते हमने उन्हें सिर्फ एक चेतावनी और तौबा का मौका दिया। हमारे वज़ीर-ए-आज़म ने दुनिया के अहम मुल्कों में अपने नुमाइंदे भेजकर हमारा पक्ष साफ़ किया। हम एक अमन पसंद मुल्क हैं, मगर बेगुनाहों पर हमला अब बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

इस हमले का असर कश्मीर के टूरिज़्म सेक्टर पर भी पड़ा। सैलानियों के दिलों में डर बैठ गया, जिससे होटल और टूर बुकिंग्स रद्द होने लगीं और आमदनी पर असर पड़ा। हुकूमत ने हालात सामान्य करने के लिए सख़्त सुरक्षा इंतज़ाम किए। घाटी के लोगों ने भी समझा कि इस हमले ने उनकी रोज़ी-रोटी को कितना नुकसान पहुंचाया। रोज़मर्रा की ज़रूरतों से लेकर बच्चों की तालीम और बुज़ुर्गों की दवाइयों तक सब कुछ प्रभावित हुआ। कुछ लोगों के गलत कामों का असर पूरे समाज पर पड़ा। अवाम ने समझा कि अगर बेहतर मुस्तक़बिल चाहिए, तो उन्हें इन झूठे हमदर्दों के खिलाफ आवाज़ उठानी होगी।

आज हर कश्मीरी अपने मुल्क के भाई-बहनों के साथ खड़ा है, और हर मंच पर इस हमले की मुखालफत कर रहा है। लोगों के दिलों में एक-दूसरे के लिए हमदर्दी और समझ बढ़ी है। धीरे-धीरे सैलानी फिर से घाटी की तरफ लौटने लगे। अमरनाथ यात्रा भी अमन के साथ मुकम्मल हुई, जिसमें लगभग 3 लाख से ज़्यादा यात्रियों ने पवित्र गुफा के दर्शन किए। कश्मीर मैराथन जैसे आयोजनों ने भी टूरिज़्म को फिर से उम्मीद दी।

पहलगाम हमला एक दर्दनाक याद है, मगर इसने हमें मज़बूती भी सिखाई है। ये हमें बताता है कि मुश्किल हालात में डटकर खड़ा रहना चाहिए। ज़िंदगी में ऐसे मोड़ आते हैं, मगर उनसे सीखकर आगे बढ़ना ज़रूरी है। ग़म से निकलने के लिए घर-परिवार और समाज का सहारा, और खुद की मज़बूत हिम्मत बेहद ज़रूरी होती है।

हम अतीत को भूलेंगे नहीं, मगर उससे सीख लेकर एक बेहतर और मुस्तहकम (मज़बूत) भविष्य के लिए एकजुट रहेंगे। क्योंकि एक टोकरी में एक सड़ा हुआ सेब होने से पूरी टोकरी को खराब नहीं कहा जा सकता—कुछ लोगों के ग़लत कामों से पूरे समाज को जज करना मुनासिब नहीं।

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