हम पहले कभी इतने भयभीत नहीं थे : बदहाल गांव वाले

गांव वालों में भय इस हद तक व्याप्त हो गया है कि जब वह दुखी थे तो कई लोग उनसे मिलने से भी कतराने लगे।

बदहाल, 19 जनवरी : राजौरी जिले के इस सुदूर पहाड़ी गांव के लोगों के चेहरों पर भय और दुख साफ झलक रहा है। पिछले 45 दिनों में एक के बाद एक हुई रहस्यमय मौतों से वे स्तब्ध हैं।

एक स्थानीय व्यक्ति ने कहा कि उनमें मौत का डर कभी इतना अधिक नहीं था, यहां तक ​​कि कोविड महामारी के दौरान भी नहीं, या जब उग्रवाद अपने चरम पर था।

अधिकारियों ने इन मौतों के पीछे किसी संक्रामक बीमारी की संभावना से इनकार किया है।

सीएसआईआर-आईआईटीआर की पोस्टमार्टम रिपोर्ट में न्यूरोटॉक्सिन की मौजूदगी का खुलासा होने के बाद पुलिस की एक नवगठित विशेष जांच टीम ने जांच के लिए 60 से अधिक लोगों को पूछताछ के लिए हिरासत में लिया है।

राजौरी जिला मुख्यालय से लगभग 55 किलोमीटर दूर स्थित इस गांव के लोग भय से ग्रस्त हैं और चाहते हैं कि रहस्य का समाधान हो जाए।

अस्पताल में भर्ती होने के कुछ दिनों के भीतर ही लोगों ने बुखार, दर्द, मतली तथा  बेहोशी की शिकायत की और फिर उनकी मौत हो गई। एक लड़की अकेले ही इस प्रवृत्ति को तोड़कर कई दिनों तक इस स्थिति को झेलने में सफल रही। हालांकि उसकी हालत अभी भी गंभीर बनी हुई है।

एक डॉक्टर के अनुसार, मरीजों के एमआरआई स्कैन से मस्तिष्क में एडिमा का पता चला, जो एक ऐसी स्थिति है जिसमें मस्तिष्क के ऊतकों में तरल पदार्थ जमा हो जाता है।

नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता और स्थानीय विधायक जाविद इकबाल चौधरी ने पीटीआई-भाषा से कहा, "यह हम सबके लिए एक बड़ी चुनौती है... मैं लोगों से अपील करता हूं कि अगर किसी के पास कोई सुराग है तो कृपया आगे आएं और चल रही जांच में मदद करें।"

चौधरी ने कहा, "सरकार ने स्थिति का बहुत संवेदनशील तरीके से जवाब दिया और कोई कसर नहीं छोड़ी। जम्मू-कश्मीर के अंदर और बाहर से स्वास्थ्य टीमों को बुलाया गया और सभी ग्रामीणों की कम से कम समय में जांच की गई।"

उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री पहले दिन से ही स्थिति पर नजर रख रहे हैं।

उन्होंने कहा, ‘‘मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में हुई बैठक में बताया गया कि एसआईटी ने पूछताछ के लिए कुल 68 लोगों को हिरासत में लिया है।’’ उन्होंने उम्मीद जताई कि जांच पूरी होने के बाद सब कुछ स्पष्ट हो जाएगा।

शोकग्रस्त असलम ने अपने परिवार के खिलाफ किसी “षड्यंत्र” की संभावना से इनकार नहीं किया।

उन्होंने कहा, "सैकड़ों लोगों ने दावत की, लेकिन हुसैन और उनके बच्चों की मौत पहले हुई। कुछ दिनों बाद मेरे चचेरे भाई की पत्नी और बच्चों की मौत हो गई तथा  फिर मौत मेरे दरवाजे पर आ पहुंची। ऐसा कैसे हो सकता है कि सिर्फ़ हमारा परिवार ही इस तरह से खत्म हो गया?" उन्होंने आगे बताया कि उनके परिवार ने हुसैन के घर पर खाना खाया, जहां मौतों के 40वें दिन एक विशेष प्रार्थना सभा आयोजित की गई थी।

उन्होंने कहा कि गांव वालों में भय इस हद तक व्याप्त हो गया है कि जब वह दुखी थे तो कई लोग उनसे मिलने से भी कतराने लगे।

स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता ज़हीर अहमद गोरसी ने कहा कि गांव के लोग अभी भी इन अकारण मौतों को स्वीकार नहीं कर पाए हैं। "एक नया कब्रिस्तान तैयार किया जाना है... यह पूरे गांव के लिए एक परीक्षा की घड़ी है।"

असलम के रिश्तेदार जाहिद शाह ने कहा कि उन्हें प्रशासन और पुलिस पर पूरा भरोसा है।

एक अन्य रिश्तेदार नाज़िम दीन ने कहा, "इस तरह का डर तब भी नहीं था जब उग्रवाद अपने चरम पर था या कोविड-19 महामारी के दौरान भी। लोग मृतकों की कब्र खोदने के लिए भी आगे नहीं आ रहे हैं।"

इससे पहले, एक सरकारी प्रवक्ता ने कहा कि जांच और नमूनों से स्पष्ट रूप से पता चलता है कि ये घटनाएं जीवाणु या विषाणु जनित संक्रामक बीमारी के कारण नहीं हुई हैं और इसमें जन स्वास्थ्य से जुड़ा कोई पहलू नहीं है।

"पीड़ितों और ग्रामीणों से लिए गए सभी नमूनों में किसी भी वायरल या बैक्टीरियोलॉजिकल एटियोलॉजी की पुष्टि नहीं हुई है। देश की कुछ सबसे प्रतिष्ठित प्रयोगशालाओं में विभिन्न नमूनों पर परीक्षण किए गए।"

“सीएसआईआर-आईआईटीआर द्वारा किए गए विष विज्ञान संबंधी विश्लेषण में कई जैविक नमूनों में विषाक्त पदार्थों का पता चला है।”

मोहम्मद असलम ने 12 से 17 जनवरी के बीच अपने पांच बच्चों और अपने मामा-मामी को खो दिया, जिन्होंने उसे गोद लिया था।

असलम के बहनोई फजल हुसैन और उनके चार बच्चों की 7 दिसंबर को गांव में संदिग्ध परिस्थितियों में सबसे पहले मौत हो गई थी। शुरू में माना गया था कि उनकी मौत भोजन विषाक्तता के कारण हुई, क्योंकि परिवार कुछ समय पहले ही एक शादी में शामिल हुआ था।

असलम के चचेरे भाई मोहम्मद रफीक की गर्भवती पत्नी और उसके तीन बच्चों की 12 दिसंबर को मृत्यु हो गई।

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