हामिद मीर का बड़ा खुलासा, पीओजेके और गिलगित-बाल्टिस्तान में बढ़ रहा फौज विरोधी ग़ुस्सा


पाकिस्तान के वरिष्ठ सहाफ़ी हामिद मीर के एक वीडियो बयान ने पाकिस्तान के कब्ज़े वाले जम्मू-कश्मीर (पीओके) और गिलगित-बाल्टिस्तान (जीबी) में उभरते हालात पर नई बहस छेड़ दी है। अपने बयान में हामिद मीर ने माना कि पाकिस्तान की फौजी हुकूमत ने अपने ही खिलाफ़ दो बड़े मोर्चे खड़े कर लिए हैं—एक गिलगित-बाल्टिस्तान में और दूसरा तथाकथित पीओके में। उनका कहना है कि इन इलाक़ों में अवाम लगातार अपने हक़ूक़, संसाधनों और बेहतर ज़िंदगी की मांग को लेकर आवाज़ बुलंद कर रही है, लेकिन जवाब में उन्हें सख़्ती और दमन का सामना करना पड़ रहा है।

हामिद मीर ने अपने बयान में इस बात पर तशवीश जताई कि जो लोग स्थानीय मसाइल और अधिकारों की बात करते हैं, उन्हें अक्सर “भारतीय एजेंट” या “बाहरी ताक़तों के समर्थक” करार देकर बदनाम करने की कोशिश की जाती है। उनके मुताबिक़, यह रवैया हालात को बेहतर बनाने के बजाय और ज़्यादा बिगाड़ रहा है। उन्होंने कहा कि किसी भी अवामी आंदोलन को केवल आरोपों और दमन के ज़रिए दबाया नहीं जा सकता।

रिपोर्ट्स के अनुसार, गिलगित-बाल्टिस्तान और पीओके में पिछले कुछ समय से महंगाई, बेरोज़गारी, बिजली संकट, टैक्स नीतियों और संसाधनों के बंटवारे को लेकर लगातार विरोध प्रदर्शन देखे जा रहे हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि उनके इलाक़ों के प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल तो किया जा रहा है, लेकिन विकास और बुनियादी सुविधाओं के मामले में उन्हें अपेक्षित लाभ नहीं मिल रहा।

हामिद मीर के बयान को इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि वह पाकिस्तान के मुख्यधारा मीडिया की एक जानी-पहचानी आवाज़ हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि जब देश के भीतर से ही प्रभावशाली पत्रकार इस तरह की चेतावनी दे रहे हैं, तो यह इस बात का संकेत है कि हालात सामान्य नहीं हैं। उनका मानना है कि पीओके और गिलगित-बाल्टिस्तान में बढ़ती अवामी नाराज़गी अब केवल स्थानीय मुद्दा नहीं रह गई, बल्कि यह पाकिस्तान की नीतियों पर गंभीर सवाल खड़े कर रही है।

विश्लेषकों के मुताबिक़, इन इलाक़ों में लोगों के बीच यह भावना मज़बूत हो रही है कि उनकी आवाज़ को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जा रहा। कई मौक़ों पर प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच टकराव की खबरें भी सामने आई हैं। सोशल मीडिया पर वायरल होने वाले वीडियो और स्थानीय रिपोर्ट्स इस बात की तरफ़ इशारा करते हैं कि अवाम के अंदर बेचैनी लगातार बढ़ रही है।

हामिद मीर ने अपने बयान में यह भी संकेत दिया कि केवल सख़्ती के ज़रिए हालात को नियंत्रित करने की कोशिश उल्टा असर डाल सकती है। उनके अनुसार, जब लोगों की जायज़ शिकायतों को सुना नहीं जाता और विरोध को दबाने की कोशिश की जाती है, तो इससे नाराज़गी और गहरी होती है। उन्होंने अप्रत्यक्ष तौर पर यह संदेश दिया कि समस्याओं का समाधान संवाद और जनहितकारी नीतियों के ज़रिए ही संभव है।

सियासी पर्यवेक्षकों का कहना है कि पीओके और गिलगित-बाल्टिस्तान में उभर रही यह स्थिति पाकिस्तान के नीति-निर्माताओं के लिए एक गंभीर चेतावनी है। उनका मानना है कि यदि स्थानीय आबादी की मांगों और शिकायतों पर ध्यान नहीं दिया गया, तो आने वाले दिनों में विरोध प्रदर्शनों का दायरा और व्यापक हो सकता है।

फ़िलहाल, हामिद मीर के बयान ने पाकिस्तान के भीतर और बाहर एक नई चर्चा को जन्म दिया है। यह घटनाक्रम इस बात की ओर इशारा करता है कि पीओके और गिलगित-बाल्टिस्तान में अवामी असंतोष एक महत्वपूर्ण राजनीतिक मुद्दे के रूप में उभर रहा है, जिस पर आने वाले समय में और अधिक ध्यान केंद्रित होने की संभावना है।

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