दक्षिण कश्मीर के Shopian में 23 मई 2026 को उस वक्त उम्मीद और जागरूकता का एक नया मंजर देखने को मिला जब हजारों की तादाद में महिलाएँ, छात्र और युवा “मेगा नशा मुक्त पदयात्रा” में शामिल हुए। जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल Manoj Sinha की अगुवाई में निकाली गई इस विशाल पदयात्रा ने पूरे इलाके में एक मजबूत पैगाम दिया कि नया कश्मीर अब नशे और तबाही के खिलाफ एकजुट होकर खड़ा हो रहा है।
सुबह से ही शोपियां की सड़कों पर बड़ी संख्या में लोग जमा होने लगे थे। हाथों में “नशा छोड़ो, भविष्य जोड़ो”, “युवा बचाओ, कश्मीर बचाओ” और “स्वस्थ समाज, सुरक्षित कश्मीर” जैसे बैनर लिए युवाओं और महिलाओं ने पूरे जोश के साथ पदयात्रा में हिस्सा लिया। स्थानीय स्कूलों, कॉलेजों, स्वयंसेवी संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की मौजूदगी ने इस मुहिम को एक जनआंदोलन का रूप दे दिया।
मार्च के दौरान महिलाओं की सक्रिय भागीदारी सबसे ज्यादा चर्चा का केंद्र रही। कई स्थानीय महिलाओं ने कहा कि नशे की लत ने घाटी के अनेक परिवारों को प्रभावित किया है और अब समाज खुद इस बुराई के खिलाफ आवाज़ उठाने लगा है। उनका कहना था कि अगर माँएँ और बेटियाँ आगे आएँगी तो आने वाली नस्लों को इस खतरे से बचाया जा सकता है।
युवाओं ने भी इस अभियान में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हुए यह संदेश दिया कि कश्मीर का नौजवान अब हिंसा और नशे के अंधेरे से निकलकर शिक्षा, तरक्की और बेहतर भविष्य की राह चुनना चाहता है। पदयात्रा में शामिल छात्रों ने कहा कि नशा केवल एक व्यक्ति को नहीं बल्कि पूरे समाज और आने वाली पीढ़ियों को बर्बाद करता है। उन्होंने प्रशासन से इस तरह के जागरूकता अभियानों को लगातार जारी रखने की अपील भी की।
उपराज्यपाल Manoj Sinha ने इस मौके पर कहा कि जम्मू-कश्मीर को नशामुक्त बनाना केवल सरकारी मिशन नहीं बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी है। उन्होंने युवाओं से अपील की कि वे अपने आसपास के लोगों को भी नशे से दूर रहने के लिए प्रेरित करें। उनके मुताबिक प्रशासन नशे के नेटवर्क के खिलाफ सख्त कार्रवाई के साथ-साथ पुनर्वास, जागरूकता और सामुदायिक भागीदारी पर भी विशेष ध्यान दे रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि पिछले कुछ वर्षों में जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने ड्रग्स के खिलाफ बहुआयामी अभियान चलाया है, जिसमें कानून प्रवर्तन के साथ-साथ सामाजिक जागरूकता और मानसिक स्वास्थ्य सहायता को भी प्राथमिकता दी गई है। शोपियां की यह पदयात्रा उसी व्यापक रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है, जिसका मकसद युवाओं को सकारात्मक गतिविधियों से जोड़ना और समाज में सामूहिक जिम्मेदारी की भावना पैदा करना है।
स्थानीय नागरिकों ने इस पहल को “नए कश्मीर की नई सोच” करार दिया। लोगों का कहना है कि पहले इस तरह के सामाजिक अभियानों में सीमित भागीदारी देखने को मिलती थी, लेकिन अब महिलाओं और युवाओं का खुलकर सामने आना इस बात का संकेत है कि घाटी में सामाजिक चेतना मजबूत हो रही है।
सामाजिक कार्यकर्ताओं के अनुसार, नशे के खिलाफ यह मुहिम केवल स्वास्थ्य का मुद्दा नहीं बल्कि सामाजिक सुरक्षा और सामुदायिक सशक्तिकरण से भी जुड़ी हुई है। उनका कहना है कि जब समाज खुद आगे आकर इस लड़ाई में हिस्सा लेता है तो उसका असर ज्यादा गहरा और स्थायी होता है।
शोपियां की सड़कों पर गूंजते जागरूकता के नारों और युवाओं के उत्साह ने यह स्पष्ट कर दिया कि कश्मीर अब बदलाव की दिशा में आगे बढ़ रहा है — एक ऐसा कश्मीर जो स्वस्थ, सुरक्षित और जागरूक समाज की तरफ कदम बढ़ा रहा है।

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